visfot news network 03 April, 2010 09:29;00
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने एक बार फिर सात वर्षो के बाद बिहार के किसानों को अपने चंगुल में ले ही लिया और बिहार के किसानों को मक्के की ऐसी बीज बेचकर चम्पत हो गए जिसमें अंकुरण तक नहीं आया। इनसे उपजी मक्के की फसल में दाने नहीं आए और लाखों हेक्टेयर की फसल बिहार में बर्बाद हो गई। सात साल पहले भी बिहार में मोन्सेन्टो कम्पनी के कारगिल बीज ने ऐसा ही गुल खिलाया था।
ऐतिहासिक प्रदेश बिहार के किसान संभवतः खून पसीना लगाकर महाजनों से कर्ज लेकर सरकार के मुआवजे के भरोसे खेती करना सीख रहें हैं। ऐसी हालत रही तो बिहार में भी विदर्भ, मध्यप्रदेश, आन्ध्रप्रदेश, कर्नाटक, जैसे राज्यों के समान किसानों को भी आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ेगा, जो उन जगहों पर बीटी बैंगन के मामले में हो चुका है। आज राज्य सरकार भले ही कटिहार जिले के दण्डखोड़ा प्रखण्ड के महेशपुर निवासी स्वर्गीय जगदीश शर्मा की मौत को आत्महत्या मानने को नहीं तैयार हो रही है तथा खुँटी हसैली गाँव के मो0 नजीम के सम्बन्ध में भी सरकार खुलकर कुछ नहीं कह पा रही है लेकिन ये जगदीश शर्मा एवं मो0 नजीम तो किसी भी ढ़ंग से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के ही शिकार हुए है चाहे स्वर्गीय शर्मा ने मक्के की खेत बर्बाद होने से आत्महत्या किया हो अथवा मखाना की खेत में मछली के विष के छिड़काव से मरे हो। इस आशय से यह प्रकाशित होता हैं कि वही बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ एक तरफ कीटनाशक जहरीली दवााइयाँ बनवाती है और दूसरी तरफ हायब्रिड, टर्मिनेटर एवं जी एम बीजों का भी उत्पादन करती है और भोले-भोले किसानों को लुभाकर उनसे मूल्य लेकर अपनी कमाई करते हुए उनके खेतों में इसतरह के बीजों का परीक्षण भी कर लेती है।
आखिर ऐसा हो क्यों नहीं? बिहार जैसे प्रगतिशील कृषि प्रधान राज्य में इसके रोकथाम के लिए वर्त्तमान में कोई अधिनियम नहीं बना है न ही पुराने अधिनियम का संशोधन ही हुआ है। राज्य सरकार ने प्रति हेक्टेयर बर्बाद फसल पर दस हजार रू0 की राहत देने का फैसला किया है। इस पर भी कई प्रश्न उठते है. जैसे- बर्बाद हुए फसल की गणना में ही पदाधिकारियों को कई महीनों का समय लगेगा और क्या मुआवजा से ही किसानों की क्षतिपूर्त्त हो जाएगी ?
आखिर उन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का क्या होगा जो सुदुर देशों में बैठकर नीति तैयार करते हें कि हमारे खेतों में कौन सा बीज का प्रयोग हो, साथ ही यहाँ यह दोहराना उचित होगा कि पूर्व में फिरंगियों ने हमारे मन्दिरों को लूटा अब हमारे खेतों को लुटने आए हैं।
राजेन्द्र कृषि अनुसन्धान केन्द्र के वैज्ञानिकों द्वारा इन मक्के में दाने नहीं होने की जाँच करने के बाद यह स्पष्ट हो चुका है कि मक्के के बीज में गड़बड़ी होने के कारण दाने नहीं आए लेकिन यह घोर आश्चर्य का विषय हैं कि राज्य के कई कृषि पदाधिकारियों ने संभवतः एक ही पाठ पढ़ा है और वे इस सम्बन्ध में यह कहकर अपना पल्लू झाड़ रहे हैं कि मक्के की फसल में हुई बर्बादी का मुख्या कारण सही तापक्रम का नहीं मिलना है। इसी सम्बन्ध में जी एम मुक्त बिहार अभियान के संयोजक पंकज भूषण ने जब मधेपुरा के कृषि पदाधिकारी से दुरभाष पर सम्पर्क किया तब उन्होंने, अपने जवाब में कहां कि जिस समय मक्के की बीज की बोआई हुई थी उस समय तापक्रम लगभग 8 डिग्री था जबकि तापक्रम लगभग 15 डिग्री होना चाहिए इसी कारण से मधेपुरा जिला में मक्के को नुकसान हुआ। वहीं दूसरी तरफ मुजफ्फरपुर जिले के बोचहां प्रखण्ड के प्रखण्ड कृषि पदाधिकारी ने बताया कि प्रखण्ड के सभी गांवों में यह शिकायत पाई गई है और प्रथम दृष्टया यह मौसम का प्रभाव लग रहा है जो जाँच की स्थिति के बाद पता चल पाएगा। शिवहर जिले के कृषि पदाधिकारी का भी लगभग यही बयान है। मुजफ्फरपुर के थोक बीज विक्रेता कुशवाहा बीज भण्डार, अखाड़ाघाट मुजफ्फरपुर, भी इसे मौसम का प्रभाव बताते हैं अब यह स्वतः स्पष्ट होने की बात है कि एकतरफ राज्य सरकार को दिए जा रहे प्रतिवेदन में विशेषज्ञ बीज की खराबी बता रहे हैं वहीं दूसरी तरफ बीज विक्रेता से लेकर अधिकांश कृषि पदाधिकारी इसे मौसम की खराबी बता रहे है अब इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने बीज बेचने के क्रम में क्या-क्या हथकण्डा नहीं अपनाया होगा?
अभियान के संयोजक पंकज भूषण ने जब मधेपुरा जिले के कुमारखण्ड प्रखण्ड के अन्तर्गत टेंगराहापरिहारी पंचायत गिद्धापंचायत, मघेली पंचायत के कई किसानों से जब सम्पर्क किया तब वहाँ के बलरामयादव, लखन यादव, रघुवीर यादव, दामोदर यादव, राधे यादव, श्याम सुन्दर यादव सहित कई किसानों ने कहा कि हमने अपने परिचयपत्रों को दिखाकर 160/- से 200/- रू0 किलो तक कारगील एवं पायनियर मक्का बीज कर्ज लेकर मवेशी बेचकर एवं औरतों का गहना गिरवी रखकर टाटा किसान बीज भण्डार, सिंघेश्वर मधेपुरा से मक्के का बीज यह सोचकर खरीदा कि मक्के की लहलहाती फसल हमारे कर्जो को पाटते हुए हमारे तकलीफों को दूर कर देगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मुजफ्फरपुर जिला के श्यामबाबू राय, नवल किशोर सिंह, राजेन्द्र प्रसाद यादव ने भी कमोवेश यही शिकायत की है। अब पुनः यह मंथन का विषय है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियां आखिर कब तक किसानों के किसानी से खेल करती रहेगी और सरकार मूक दर्शक बनी रहेगी? यहाँ तो सँपेरा लूटेरा की लोकोक्ती चरितार्थ हो रही है जिसमें सपेरा बीन बजाता है और लुटेरा दर्शकों की जेब खाली करता है।
कितनी अहम बात है कि एक तरफ अमेरिका के विदेश मंत्री के विज्ञान एवं तकनीकी सलाकार नीना फ्रेडरॉफ के भारत आगमन, के साथ ही केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने 10 फरवरी 2010 पूर्व घोषित कार्यक्रम के एक दिन पहले दिनांक 9 फरवरी 2010 को ही भारत की प्रथम जीएम खाद्य फसल बीटी बैंगन पर मोरेटोरियम अर्थात रोक लगा दिया। वही बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के द्वारा टर्मिनेटर बीज, निर्वंशी बीज, हाइब्रीड बीज, अवैध रूप से जीएम बीज बेचने पर सरकार की कोई पाबन्दी नहीं है और आन्ध्र प्रदेश में जब सरकार बीटी कपास के मामले में मुआवजा की घोषणा करना चाहती है तब मोन्सैन्टो जैसी अमेरिका की बहुराष्ट्रीय कम्पनी आन्ध्रप्रदेश में उच्च न्यायलय की शरण लेती है। मंसूबा तो उन कम्पनियों का इतना बढ़ गया है कि वे जब चाहे हमारे देश का सौदा कर लेवें।
अभियान के सक्रिय सदस्य बबलू प्रकाश ने कहा ‘‘दो पैसे की लालच में, देश का सौदा बन्द करो।’’अभियान के प्रान्तीय अध्यक्ष सुरेश गुप्ता ने इस मामले में कहा कि यह पूर्णतया बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की साजिश है और जब तक सरकार चेतेगी नहीं तब तक ऐसे ही उनकी साजिश सफल होती रहेगी। सभी कम्पनियाँ जानती है कि राज्यों में यहाँ तक अभियान के संयोजक भूषण ने इस बात पर जोर दिया कि आखिर क्या वजह है कि सन् 2008 में कोसी की विभिषिका से मारे हुए किसानों लोगों पर यह मक्का के बीजों का कहर इस कदर बरसा कि वे अपने महाजन का कर्ज भी चुकता करने के लायक नहीं रहे। जिसबात का खुलासा बिहार विधानसभा में शुन्यकाल के दौरान माननीय विधायकों ने किया। क्या कोसी क्षेत्र के किसान एवं जनता ही विभिन्न त्रासदियों का शिकार होगी? यह भी एक प्रश्न है। विदित हो कि एकतरफ दिनांक 09.02.2010 को केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री ने बीटी बैंगन पर रोक लगाते हुए लोकतंत्र की गरिमा की रक्षा की ओर दूसरी तरफ ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ सारे नियम कानून को ताख पर रखकर इन टर्मिनेटर बीजों का खुल्लमखुल्ला व्यापार कर रही हैं। यहाँ यह अंकित करना अनिवार्य होगा कि ‘‘नेशनल बॉयोटेक्नोलॉजी ऑथिरीटी ऑफ इण्डिया बिल – 2010’’ वर्त्तमान संसद में लम्बित है जिसमें कई खामियाँ दृष्टिगोचर हुई है, राज्य में भी इस तरह का कोई कानून नहीं है जिस वजह से इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को खुल्लमखुल्ला प्रश्रय मिल रहा है।
यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं होगी कि पड़ोसी देश नेपाल के बारा, परसा, रउताह, सरलाही एवं नवल परासी जैसे पाँच तराई जिलों के 25 हजार हेक्टेयर खेतों में मक्के की फसल बबार्द हुई है। यहाँ भी वे बीज बहुराष्ट्रीय कम्पनी के ही थे। ज्ञात हुआ कि वहाँ के किसानों ने भी पायोनियर कम्पनी, सीडटेक कम्पनी, पीनैकल कम्पनी, संध्या कम्पनी एवं मोन्सैनटो कम्पनी का बीज प्रयोग में लाया गया था। यह भी ज्ञात हुआ कि पायोनियर हाइब्रिड एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी जानसन, इंडियाना अमेरिका की है। इसी सन्दर्भ में बंनजरिया के रामकिशुन पॉल कहते है कि मैंने कृषि विकास बैंक से चार लाख रू0 का कर्ज लेकर चार बीघा में मक्के की खेती की थी, अब पूरे वर्ष परिवार को कहा से खिलाऊँगा। बंजरिया के दूसरे किसान विन्दाशाह ने इस बार मक्के की खेती से अपनी बेटी की शादी का ख्वाब देखा था जो कि ‘‘दिल की अरमा आँसुओं में बह गए’’ में परिणत हो गया। रोताहत (नेपाल) के जिला कृषि विकास कार्यालय के ओमप्रकाश कर्ण कहते है कि यहाँ साढ़े-चार हजार हेक्टेयर जमीन में पायोनियर कम्पनी के ट92 किस्म के बीजों का प्रयोग हुआ था जिसमें 90 प्रतिशत खेतों में दाना नहीं आया और उन्होंने साथ ही साथ यह भी स्वीकार किया कि पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखण्ड एवं उत्तर प्रदेश के किसान भी इसी के शिकार हुए है। परसा (नेपाल) के जिला कृषि कार्यालय के सहायक तकनीशियन दया राम हरिजन कहते हैं कि यहाँ के किसानों ने वी92 एवं संध्या ब्रॉन्ड मक्के के बीजों का उपयोग किया था और 27 अक्टूबर से 30 नवंबर तक इन बीजों की बोआई हुई थी जिसमें दाने बिल्कुल ही नहीं है। सरलाही (नेपाल) के जिला कृषि विकास कार्यालय से रामकैलाशयादव कहते है कि यहाँ 15 हेक्टेयर से वी92 मक्के के बीज बोया गया था जिसमें दाने नहीं आए।
साफ है कि ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ हमारे देश के साथ-साथ कई देशों के खेतों पर कब्जा जमाकर हमें फिर से गुलाम बनाना चाहती हैं। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि इन टेर्मिनेटर बीजों से पुनः रोपनी के लिए बीज निर्मित नहीं किए जा सकते और हर फसल के लिए हमारे किसानों को उन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के तलवे चाटने होंगे जो हमारे गरीब किसानों को आत्महत्या करने पर मजबूर करती आ रही है।

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